प्रबंध का अर्थ, परिभाषा, विशेषता, महत्व, उद्देश्य, कार्य

प्रबंध का अर्थ (meaning of management)

प्रबंध से आशय दूसरों से कार्य करने की कला से है प्रबंध के अंतर्गत इस बात को सम्मिलित किया जाता है कि उपक्रम में कर्मचारियों द्वारा अच्छे से अच्छा कार्य कैसे कराया जाए ताकि कम समय में कम लागत पर अधिकतम लाभ व लक्ष्य की प्राप्ति की जाए।

प्रबंध की परिभाषा (definition of management)

1. एफ डब्ल्यू टेलर के अनुसार— "प्रबंध यह‌ ज्ञान करने की कला है कि आप क्या करना चाहते हैं तत्पश्चात यहां देखना की सर्वश्रेष्ठ एवं मितव्ययिता पूर्ण ढंग से कैसे किया जाता है।"

2. हेनरी फयोल के अनुसार— "प्रबंध का आशय पूर्ण अनुमान लगाना या योजना बनाना आदेश देना समन्वय करना तथा नियंत्रण करना है।"

प्रबंध की विशेषता (specialty of management)

1. प्रबंध के सिद्धांत गतिशील है— प्रबंध अपने समक्ष नित्य प्रति उपस्थिति समस्याओं का सूक्ष्म विश्लेषण करता है और तदनुसार गंभीर निर्णय लेने उसे कार्य करता है। प्रबंध सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ प्रबंध तकनीकी में नवीनता लाने का प्रयास करता है इससे स्पष्ट है कि प्रबंध सामाजिक परिवर्तन को अधिक गतिशील प्रदान करता है।

2. प्रबंध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है— प्रबंध में नियोजन क्रियान्वयन, नियंत्रण ,समन्वय ,अभिप्रेरणा ,निर्देशन इत्यादि सम्मिलित हैं, जिनकी सहायता से पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकती है।

3. प्रबंध का निश्चित उद्देश्य होता है— प्रत्येक प्रबंध प्रक्रिया का विशिष्ट उद्देश्य होता है, जिनका निर्धारण प्रशासन द्वारा किया जाता है।

4. सामूहिक प्रयास- प्रबंध में सामूहिक प्रयासों पर ध्यान दिया जाता है, व्यक्ति विशेष पर ध्यान नहीं दिया जाता है, दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि एकता के साथ सामूहिक संस्था के लिए कार्य करना प्रबंध का लक्ष्य है।

5. प्रबंध कला एवं विज्ञान है- कर्मचारियों को दिशा निर्देश देकर उनसे कार्य लेना कला है और अपने निश्चित सिद्धांतों एवं नियमों के कारण इसे विज्ञान भी कहा जा सकता है।

6. प्रबंध विश्वव्यापी है- प्रबंध को हम किसी संस्था, देश, सामान्य व्यक्ति तक सीमित नहीं रख सकते हैं, बल्कि यह विश्वव्यापी होने के कारण सभी देशों, कार्य तथा संस्थाओं में फैला हुआ है।

7. अदृश्य कौशल- प्रबंध को देखा नहीं जा सकता है, यह कार्य के परिणाम के रूप में हमारे सामने आता है, यदि कार्य के प्रयास सफल होते हैं, दुआ अच्छा प्रबंध कहलाता है। इसके विपरीत यदि कोई असफल होते हैं तो वहां पर प्रबंध की अकुशलता साबित होती है।

प्रबंध के तीन कार्य

उचचस्तरीय प्रबंध के कार्य

  1. उपक्रम के उद्देश्य को निर्धारित करना।
  2. संस्था के ट्ररटी के रूप में उनकी रक्षा करना।
  3. मुख्य अधिशासी का चयन करना।
  4. संस्था की उपलब्धियों व परिणामों की जांच करना।
  5. बजट को पारित करना।
  6. आज का उचित विस्तार करना।
  7. महत्वपूर्ण विषयों पर विचार विमर्श करना।
  8. व्यवसाय के दीर्घकालीन स्थायित्व के लिए प्रयास करना।

मध्यस्तरीय प्रबंध के कार्य

  1. मुख्य अधिशासी की क्रियाओं में सहायता प्रदान करना।
  2. संचालनात्मक निर्णय से सहयोग करना।
  3. प्रतिदिन के परिणामों से संपर्क बनाए रखना।
  4. उत्पादन की उपलब्धियों की समीक्षा करना।
  5. उच्च स्तरीय प्रबंध द्वारा तय की गई सीमाओं के मध्य निर्धारित नीतियों का क्रियान्वयन करना।
  6. अधीनस्थों के कार्यों का मूल्यांकन।
  7. उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु योजना तैयार करना।
  8. उच्च और निम्न स्तर के मध्य समन्वय एवं संप्रेषण का कार्य करना।

निम्नस्तरीय प्रबंध के कार्य

  1. संस्था के उद्देश्यों एवं लक्ष्य की पूर्ति हेतु योजनाएं बनाना।
  2. कर्मचारियों को कार्य सपना सौंपना।
  3. कार्य एवं परिणामों पर निगरानी रखना।
  4. त्रुटि के स्थल पर निगाहें रखकर उनके स्थल पर नए कदम उठाना।
  5. उत्पादन कर्मचारियों से व्यक्तिगत संबंध बनाए रखना।
  6. आवश्यकता अनुसार कर्मचारियों से संपर्क बनाए रखना।
  7. कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना।
  8. कर्मचारियों के हितों और सुविधाओं का ध्यान रखकर माध्यम प्रबंधकों को उचित सूचना देना।

प्रबंध के उद्देश्य लिखिए (Management Objectives)

1. न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम परिणाम प्राप्त करना— प्रमुख यहां व्यापार के उद्देश्यों पर आधारित होते हैं जिनमें यहां प्रयास किया जाता है कि कम से कम प्रयास लागत व समय में अधिक से अधिक परिणाम प्राप्त किए जा सकें। अन्य शब्दों में उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के प्रयोग से अच्छे से अच्छे परिणाम को प्राप्त करना ही प्रबंध का मुख्य लक्ष्य होता है।

2. नियुक्त एवं कर्मचारी का विकास करना— नियुक्त एवं कर्मचारी दोनों समाज के अंग होते हैं इनके विकास से ही समाज का विकास हो सकता है प्रत्येक उपक्रम संगठन एवं व्यवसाय का उद्देश्य भी लाभ प्राप्त कर समाज का विकास करना होता है इस प्रकार प्रबंध एवं प्रयास करना है कि कर्मचारी व नियुक्ति वर्ग का विकास अधिक से अधिक हो सके इस हेतु श्रम पूंजी के मध्य समन्वय कर्मचारी प्रशिक्षण पदोन्नति एवं परिश्रमिक तथा संगठन के विकास की योजना से संबंधित कार्य करना प्रबंध का उद्देश्य होता है।

3. श्रम पूंजी में समन्वय बनाए रखना— किसी भी उपक्रम के दो प्रमुख वर्ग होते हैं एक श्रम जो उपक्रम के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा जिसके हाथ में शक्ति होती है तथा दूसरा पूंजी जो उपक्रम को संचालित करने में महत्वपूर्ण मीका निभाता है इन दोनों के मध्य संतुलन व सामान में होना आवश्यक है समन्वय व संतुलन के बिना उपक्रम ढह सकता है प्रबंध इन दोनों के मध्य सदैव पुल का काम करता है।

4. लक्ष्यों की प्राप्ति— किसी भी संगठन की स्थापना के कुछ उद्देश्य आवश्यक होते हैं इनको प्राप्त करने के लिए ही प्रबंध विभिन्न कार्य करता है यह लक्ष्य कुछ भी हो सकते हैं यहां हम व्यवसाय लक्ष्यों की ही बात करेंगे अतः व्यवसाय के लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्रबंध को संगठित किया जा सकता है।

5. सामाजिक न्याय एवं मानवीय विकास— एक प्रभावी प्रबंध समाज में समृद्धि लाता है, उन्नत परिश्रमिक कार्य की उत्तम दशाएं व अन्य सुविधाओं से कर्मचारियों का विकास तो होता ही है साथ साथ इससे श्रेष्ठ उत्पादन की परिकल्पना कर समाज के विभिन्न स्रोत को विकसित भी किया जा सकता है।

प्रबंध के प्रमुख कार्य | प्रबंध के प्रमुख कार्य को समझाइए

1. नियोजन- प्रबंध का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्राथमिक कार्य नियोजन करना है। नियोजन के अंतर्गत किसी कार्य को किस प्रकार, किस व्यक्ति से कहां पर, किस विधि से कितने समय में पूरा करना है, इसकी रूपरेखा तैयार की जाती है, ताकि निर्धारित समय में लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इसके लिए पूर्वानुमान लगाया जाता है| प्रो. टेरी ने कहा है “नियोजन भविष्य को देखने का तरीका है।”

2. संगठन- संगठन का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है। मानव एवं मशीन का सामूहिक प्रयास जो पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करता है संगठन कहलाता है। संगठन दो या अधिक व्यक्तियों का समूह होता है। मजबूत संगठन के बिना प्रबंधन अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, प्रबंध संगठन को मजबूत और प्रभावी बनाता है। व्यापार में वाणिज्य एवं उद्योग के विभिन्न साधनों में प्रभावी संबंध को स्थापित करना ही संगठन है।

3. नियुक्तियां- प्रबंध का तीसरा महत्वपूर्ण कार्य कर्मचारियों की नियुक्ति करना है, क्योंकि बिना नियुक्ति के  संगठन का प्रबंध नहीं हो सकता, नियुक्ति कार्य हेतु बड़े-बड़े उत्पादन में अलग विभाग खोला जाता है। और इसी विभाग द्वारा नियुक्तियां की जाती है। कार्य पर नियुक्ति करने के पहले व्यक्ति कार्य के लिए वह कार्य व्यक्ति के लिए सिद्धांत का पालन करना चाहिए।

4. संचालन- संचालन प्रबंध का चौथा महत्वपूर्ण कार्य है। इसे निर्देशन भी कहा जाता है। प्रबंध मस्तिष्क की भांति होता है अतः इसका कार्य संपूर्ण व्यवस्था व उद्योगों को संचालित करने का होता है। वह अन्य कर्मचारियों को आवश्यक कार्य करने हेतु निर्देश देने का काम करता है। 

5. अभिप्रेरण- यह पांचवा महत्वपूर्ण कार्य है। इसके द्वारा कर्मचारियों के प्रति कार्य में लगाओ, आकर्षण और प्रेरणा दी जाती है। जिससे कर्मचारी कार्य को लगन से करें अब डंडे से काम कर आने वाला समय नहीं रह गया है। 

6. नियंत्रण- नियंत्रण प्रबंध का छठवां महत्वपूर्ण कार्य है। व्यवसाय में खरीदी बिक्री उत्पादन बाय लाभ आदि के मध्य उचित संबंध में आवश्यक होता है, इस हेतु प्रबंध व्यवसाय की विभिन्न संपन्न हो रहे या नहीं यदि नहीं हो रहे तो कारणों को ज्ञात कर लक्ष्य अनुसार कार्य संपन्न करने का प्रयास के अनुरूप उत्पादन व वितरण आवश्यक हैं। नियंत्रण के अंतर्गत यह देखा जाता है कि पूर्व निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कार्य संपन्न हो रहे हैं या नहीं, यदि नहीं हो रहे हो तो कारणों को ज्ञात कर लक्ष्य अनुसार कार्य संपन्न करने का प्रयास किया जाता है।

7. समन्वय- वर्तमान में विरोधी विचारधारा एक स्वच्छंद रूप में कार्य करने की इच्छुक प्रबल होने के कारण समन्वय प्रबंध का एक महत्वपूर्ण कार्य हो गया है। बोलचाल की भाषा में इसे आपसी तालमेल कहते हैं। जहां अधिक संख्या में कर्मचारी होते हैं तथा उत्पादन की मात्रा अधिक होती है। प्रबंध के लिए समन्वय भी एक महत्वपूर्ण कार्य है।

प्रबंध का महत्व (importance of management)

1. पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना- प्रत्येक संस्था की स्थापना कुछ उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है। प्रबंध एक माध्यम है जो इन उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायता करता है। प्रबंध अपने ज्ञान के आधार पर भावी घटनाओं का अनुमान लगाता है। संगठन का निर्माण करता‌‌ है और कार्यभार सौंपता है। कर्मचारियों का निर्देशन करता है। उन पर नियंत्रण रखता है। कर्मचारियों को प्रेरित करता है तथा पर्याप्त परिणामों का मूल्यांकन करके विचलनो का पता लगाया जाता है

2. उत्पादन के साधनो का अधिकतम उपयोग- प्रबंध जी कैसी शक्ति है जो उत्पादन के विभिन्न साधनों में प्रभाव पूर्ण समन्वय स्थापित कर के उसका अनुकूल उपयोग करती हे अर्थात संस्था में उपलब्ध सभी साधकों सोने के बराबर माना गया है लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए साधनों से लाभ कमाना, उनका ठीक ढंग से उपयोग किया जाना जरूरी है। अतः स्पष्ट है कि सीमित साधनों का कुशलता पूर्वक उपयोग व्यवसायिक सफलता की कुंजी है।

3. प्रतिस्पर्धा पर विजय प्राप्त करना- आज व्यवसाय का आकार स्थानीय न रह कर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रूप धारण कर चुका है। जैसे-जैसे व्यवसाय का आकार बढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे प्रतिस्पर्धा में भी वृद्धि होती जा रही है। आज के निर्माता को ना केवल स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसे तीव्र प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में केवल वही संस्था बाजार में टिक सकती है जो अपने ग्राहकों को कम से कम मूल्य पर अच्छी से अच्छी क्वालिटी का माल उपलब्ध करा सके।

4. बदलते वातावरण के साथ समन्वय- प्रबंध का महत्व केवल संस्था के अंदर ही विभिन्न कार्य करने तक सीमित नहीं है बल्कि इसको बाहरी वातावरण के साथ भी समझौता करके चलाना पड़ता है। एक और तकनीकी विशेषज्ञ नए-नए उत्पादन विधियों का विकास कर रहे हैं तो दूसरी और नई-नई प्रगतिशील संस्थाएं आधुनिक पद्धति को लागू करने में व्यस्त हैं। आज ग्राहक भी उत्पादित वस्तुओं को सहज में ही स्वीकार नहीं करता क्योंकि उनके जीवन स्तर में बढ़ोतरी के साथ साथ उन में जागृति आ गई है तथा उनकी रुचि में भी परिवर्तन होते रहते हैं। इस तरह दिन प्रतिदिन बदलते वातावरण के साथ समन्वय का कार्य एक कुशल प्रबंधक ही कर सकता है।

5. बड़े पैमाने के व्यवसाय का कुशल संचालन- बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभों को देखते हुए आज इसे प्राथमिकता दी जाने लगी है। जब उत्पादन बड़े पैमाने पर होगा तो उत्पादन के साधनों की भी प्रचुर मात्रा में आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त व्यवसाय को अनेक वैधानिक औपचारिकता का भी सामना करना पड़ेगा।

प्रबंध के विभिन्न स्तर (different levels of management)

1. उच्च स्तरीय प्रबंध- किसी उपक्रम के प्रबंध स्तरों में उच्च स्तरीय प्रबंध का स्थान सर्वोपरि होता है। एक बड़े आकार के उपक्रम के उद्देश्य व नीतियों को सामान्यता संचालक मंडल द्वारा निर्धारित किया जाता है। संचालक मंडल के कार्यों का वास्तविक प्रबंध संचालक या महाप्रबंधक करते हैं, जिसे मुख्य अधिशासी करते हैं। मुख्य अधिशासी का प्रमुख कार्य संचालक मंडल द्वारा जारी निर्देशों, नीतियों को जारी करना है और उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक क्रियाएं करना होता है।

2. मध्य स्तरीय प्रबंध- इस स्तर में विभागीय प्रबंधक जैसे उत्पादन प्रबंधक, विपणन प्रबंधक, वित्त प्रबंधक, कर्मचारी तथा इनके नीचे के अधिकारी जिनमें अधीक्षक, उपाध्यक्ष आदि को शामिल किया जाता है।

3. निम्न स्तर प्रबंधक- इस स्तर पर मुख्यतः फोरमैन पर्यवेक्षक या कार्यालय पर्यवेक्षकों को शामिल किया जाता है। इस स्तर के प्रबंधकों का मुख्य कार्य यह देखना होता है कि उनके नीचे के कर्मचारियों ने कार्य ठीक ढंग से किया है या नहीं। इस स्तर के प्रबंधकों का कार्य कर्मचारियों की नीतियां स्पष्ट करना, आवश्यक स्तर निर्धारित करना, अनुदेश देना, मार्ग प्रशस्त करना, अभिप्रेरणा देना आदि है।

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