अकबर की धार्मिक नीति अपनाने के कारण, परिणाम एवं विशेताएं | Akbar ki Dharmik Neeti in hindi

अकबर द्वारा उदार नीति अपनाने के कारण

Akbar ki Dharmik Neeti in hindi


     उदार का मतलब- बहुत ही खुले दिल का होना, किसी भी चीज को अपना लेना। अकबर ने कई कारणों से गैर इस्लामीयों के प्रति उदार नीति अपनाएं उनमें से कुछ निम्न थे।


1. निजी जीवन और व्यक्तित्व- अकबर जन्मजात उदार तथा सहनशील स्वभाव का व्यक्ति था। अकबर के जन्म की परिस्थितियां बचपन का पालन पोषण और उसके गुरु शेख अब्दुल लतीफ की शिक्षाओं ने उसे उदार हृदय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह स्वयं इबादत खाने को वाद विवाद से यह सत्य पूर्णता यह जान गया की नामों की विभिन्न ता के बावजूद राम और रहीम तथा गॉड एक हैं। वह सच्चा राष्ट्रीय शासक बनना चाहता था।


2. राजनीतिक आवश्यकता- अकबर ने अपने साम्राज्य को विस्तृत और सुदृढ़ बनाना चाहा। वह जानता था कि भारत की जनसंख्या में हिंदुओं का बाहुल्य है। उसे यह पक्का विश्वास था कि हिंदुओं के सहयोग और सहानुभूति के बिना मुगल साम्राज्य की रक्षा, विस्तार, स्थाई शांति, सफल कानूनी व्यवस्था आदि असंभव है। की अनेक जातियों के गुणों से प्रभावित था। संपूर्ण भारत पर राज्य करने के लिए मुगल सैनिकों का अभाव था। उसने लोगों में फैले इस क्रांति को समाप्त करने के लिए मुगल विदेसी शासक हैं हिंदुओं के प्रति उदारता की नीति अपनाना जरूरी समझा।


3. व्यक्तियों का प्रभाव- अकबर से पूर्व 15 वीं शताब्दी में देश के विभिन्न भागों में अनेक शासकों ने गैर संप्रदायिक और धार्मिक संस्कृत साहित्य का फारसी में अनुवाद करा कर स्थानीय भाषाओं के साहित्य को संरक्षण देकर धार्मिक सहिष्णुता की उदार नीति अपनाकर और दरबार तथा सेना में हिंदुओं को महत्वपूर्ण पद देकर दोनों संप्रदायों के लोगों में परस्पर एक दूसरे को समझने का वातावरण पैदा किया था। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने अकबर को उदार एवं सांसद नीति अपनाने को प्रोत्साहन दिया। भक्ति आंदोलन का सूफी संतों के समर्थक एवं अनुयायियों ने भी अकबर को उदार तथा सहनशील नीति अपनाने को प्रोत्साहित किया। उसकी मां (हमीदा बानो) और संरक्षक बैरम खां, शिया संप्रदाय से संबंध रखते थे। उसकी राजपूत पत्नियों ने भी उसे सहनशील बनने में सहायता की। इस तरह राजमहल के वातावरण एवं उदार व्यक्तियों ने अकबर को उदार हृदय बनाया।


अकबर की धार्मिक नीति | Akbar ki Dharmik neeti

   अकबर की धार्मिक नीति गैर इस्लामीयों के प्रति सहिष्णुता (सहन करने वाला) की नीति थी। उसने दिल्ली सल्तनत कालीन सुल्तानों और अपने परवर्ती मुगल सम्राटों के प्रति कठोर क्रूर शत्रुता पूर्ण नीति का शीघ्र ही परित्याग कर दिया। वह प्रथम राष्ट्रीय शासक था जो अपने साम्राज्य की न्यू हिंदू तथा मुस्लिम दोनों संप्रदायों की सद्भावना पर रखना चाहता था। उस की धार्मिक नीति ने देश में शांति समृद्धि और एकता के नए युग का सूत्रपात किया। उसने हिंदू मुस्लिम जनता को एक सामान्य रंगमंच प्रदान करने के लिए दीन ए इलाही नामक संघ या धर्म की स्थापना की।


अकबर के धार्मिक विचारों का विकास


अकबर के धार्मिक विचारों का विकास एकाएक नहीं हुआ। निसंदेह हुआ प्रारंभ में अकबर कट्टर परंपरावादी मुसलमान रहा। 1562 ई. से 1582 ई.  तक उसके धार्मिक विचारों में निरंतर परिवर्तन आता रहा। उसके धार्मिक विचारों की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन इस प्रकार से किया जा सकता है।


1. परंपरावादी मुसलमान- प्रारंभ में अकबर परंपरावादी मुसलमान था वह राज्य के प्रमुख काजी अब्दुल नबी खां का बहुत आदर करता था। वह रहस्यवादी विचारों में मगन रहता था और अपनी सफलताओं के लिए खुदा का शुक्रिया अदा करने के लिए अनेक बार प्रातः काल आगरा के महल के सामने एक पुरानी इमारत के समक्ष पत्थर पर बैठकर प्रार्थना करता था और धार्मिक और रहस्यावादी विचारों में खोया रहता था।


2. धार्मिक नीति से संबंधित प्रारंभिक कार्य- अकबर ने 1562 ईस्वी में धार्मिक सहनशीलता की नीति को अपनाना शुरू किया। उस समय वह केवल 20 वर्ष का ही था। उसने फरमान जारी कर के युद्ध में लड़ने वाले स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाने और युद्ध बंदियों को इस्लाम में दीक्षित करना वर्जित कर दिया। 1563 ई. में हिंदुओं पर तीर्थ यात्रा कर और 1564 ई. में जजिया कर समाप्त कर दिया। उसने एक गैर मुसलमानों के लिए राज के नियुक्तियां खोल दी और इसी वर्ष आमेर के राजा भारमल की पुत्री मनीबाई से विवाह किया। वह आप भी नियम पूर्वक नमाज पढ़ता था और सलीम चिश्ती जैसे संतों की मजार पर जाया करता था।


3. इबादतखाने की स्थापना- अकबर ने अपने धार्मिक विचारों में उदार दृष्टिकोण के निरंतर विकास के साथ-साथ जहां एक और अनेक उधार विचार वाले जवानों को एकत्र किया वहीं उसने 1575 ईसवी में अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनावाया। अकबर ने इस प्रार्थना भवन में विशेष धर्मगुरुओं, रहस्यवादियों और उस समय के प्रसिद्ध विद्वानों को आमंत्रित कर उनके साथ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा की। पहले या इबादत खाना केवल मुसलमानों के लिए ही खुला था और मुलायम ने आपस में ही झगड़ा शुरू कर दिया था इसलिए उसने इबादत खाने के द्वार गैर मुस्लिम विद्वानों और विचारकों के लिए खोल दिए। अब इबादत खाने में सभी धर्मों- हिंदू, जैन, फारसी और ईसाई तथा नास्तिकों ने भी हिस्सा लेना शुरू किया।


4. खुत्बा पढ़ना और भूमि अनुदान देना- अकबर ने 16 जून 1579 ई. में फतेहपुर सीकरी में जमा मस्जिद के इमाम को हटाकर स्वयं खुदबा पढ़ा। इस खुतबे की रचना फांसी के प्रसिद्ध कवि फैजी ने की थी। उसने हिंदू जैन और फारसी संस्थाओं को भूमि अनुदान देना शुरू किया। वैसे भारत के बाहर अन्य इस्लामी देशों में शासकों के लिए खुत्व पटना कोई नई बात नहीं थी लेकिन यहां कट्टर मुसलमानों ने इसे नई परंपरा समझा और अकबर के विरुद्ध इस्लाम विरोधी कार्य करने की अफवाहें फैलाई गई।


5. मजहर जारी करना- अकबर कट्टरपंथियों के सामने नहीं झुका। उसने बुलाओ से निपटने के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अगस्त सितंबर 1579 ई. में मजहर की घोषणा की। इस घोषणा पर प्रमुख उलेमाओं के हस्ताक्षर थे। इस घोषणा में कहा गया कि यदि कुरान की व्याख्या करने वाले समर्थ विद्वानों में परस्पर मतभेद होगा तो अकबर को यह अधिकार है कि वह उनमें से किसी भी व्यक्ति को स्वीकार कर सकता है। जो की बहुसंख्यक जनता और देश के हित में हो। इसमें यह भी कहा गया कि अगर अकबर कुरान का अनुसरण करते हुए कौम तथा देश के हित में कोई नई आज्ञा जारी करें तो उसे सभी को स्वीकार करना होगा। इस तरह अकबर स्वयं प्रधान धर्म कार्य या धार्मिक कानून बनाने वाला नहीं बना बल्कि उसने कुरान की व्याख्या करने का अंतिम निर्णय स्वयं प्राप्त कर लिया।


6. मजारों की यात्रा का त्याग- अकबर ने 1579 ई. के बाद किसी संत के मजार की यात्रा नहीं की। उसने इन यात्राओं को संकुचित दृष्टिकोण बहूदेववादि और मूर्तिपूजा के समीप मानकर छोड़ा।


7. व्यक्तिगत भेंटों की चर्चाओं का प्रारंभ- अकबर ने इबादत खाने में हुए धार्मिक वाद विवाद की कड़वाहट और उसमें प्रत्येक धर्म के प्रतिनिधियों द्वारा दूसरे धर्म को नीचा बताने के प्रयासों को देखकर 1582 ईस्वी में इबादतखाने की चर्चाएं बंद कर दी। उसने विभिन्न धर्मों के नेताओं संतों और योगियों से निजी तौर पर भेंट की। उदाहरण के लिए, उसने हिंदू धर्म की शिक्षाओं और सिद्धांतों को जानने के लिए पुरुषोत्तम और देवी को आमंत्रित किया। उसने जैन को समझने के लिए कठियावाड़ केसे प्रमुख जैन संत हरीविजय सूरी को अपने दरबार में 2 वर्षों तक सम्मान दिया। अकबर ने ईसाई धर्म के सिद्धांतों को समझने के लिए गोवा से पुर्तगाली विद्वानों को बुलवाया। उसने समय-समय पर सूफी संतों और योगियों के साथ भेंट की। इन बेटों के फल स्वरुप उसे विश्वास हो गया कि धर्म के नामों और आराध्य देवों के नामों में विभिन्न तय होती है। सभी धर्मों की बातें अच्छी है। उसने यह निश्चय किया कि यदि अनेक धर्मों की अच्छी-अच्छी बातों पर बल दिया जाए तो देश के विभिन्न संप्रदायों के लोगों में सद्भावना और मित्रता पैदा की जा सकती है।


8. नए धर्मों की स्थापना- इसमे एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है की दीन-ए-इलाही क्या है - अकबर ने विभिन्न धर्मों के नेताओं से बातें करके अनुभव किया कि नामों और स्वरूपों की अनेकता के बावजूद ईश्वर एक है। अकबर धार्मिक विवादों के कारण बहुत दु:खी था क्योंकि इससे राष्ट्र की प्रगति और सद्भावना के वातावरण को बनाने में बाधा पड़ रही थी। इसलिए उसने इस समस्या का हल सोच निकाला कि कोई ऐसा धर्म होना चाहिए जिसमें सभी धर्मों की अच्छाइयां तो हो किंतु किसी धर्म के दोष ना हो। इसलिए अकबर ने दिन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की। अकबर इस धर्म के माध्यम से भारत के विभिन्न संप्रदाय के अनुयायियों में सामंजस्य उत्पन्न करना चाहता था। लेकिन ना तो उसने इस धर्म के प्रचार में कोई रुचि ली और ना ही किसी पर इसका अनुयाई बनने का दबाव डाला है। उसकी मृत्यु के बाद शीघ्र ही यह भी समाप्त हो गया।


अकबर की धार्मिक नीति की प्रमुख विशेषताएं

अकबर की धार्मिक नीति की विशेषताएं लिखिए (akbar ki Dharmik Niti ki vhisheshtayen)


1. अकबर ने एक फरमान जारी करके युद्ध बंदियों को इस्लाम में दीक्षित करना वर्जित कर दिया।

2. उसने 1563 ई. में प्रयाग और बनारस जैसे तीर्थ स्थानों पर स्नान करने पर भी समाप्त कर दिया।

3. उसने 1564 ईस्वी में जजिया कर को समाप्त कर दिया। इस्लामी नियमों के अनुसार मुस्लिम राज्य में गैर मुसलमानों को जजिया कर देना पड़ता था। 

4. अकबर ने गैर मुसलमानों के लिए राजकीय सेवा की नियुक्तियां 1562 ईस्वी में ही खोल दी थी।

5. अकबर ने अनेक हिंदू राजाओं एवं उच्च घरानों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उदाहरण के लिए आमेर के राजा भारमल की छोटी बेटी मनीबाई से विवाह किया। जैसलमेर और बीकानेर के शासकों ने भी अकबर के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए।

6. अकबर ने सामान्य हिंदू जनता और मुसलमानों के साथ एक जैसा व्यवहार किया। मैं अपने मंदिर बनाने पुराने मंदिरों की मरम्मत कराने आदि की पूरी छूट दी। वे अपने सभी त्यौहार एवं रीति रिवाज पूरी स्वतंत्रता के साथ मना सकते थे। 

7. अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों को महल के अंदर अपनी इच्छा अनुसार पूजा अर्चना करने के पूर्व छूट दे दी थी।

8. उसने स्वयं अनेक हिंदू रीति-रिवाजों को अपनाया। वह तिलक लगाया करता था और हिंदू त्योहारों होली दीपावली तथा रक्षाबंधन आदि में भाग लिया करता था।

9. उसने सभी धर्मों के विद्वानों का समान आदर किया और लगभग 1575 ई. में अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में इबादतखाने की स्थापना की। इस इबादतखाने में उसने विभिन्न धर्मों के विशेष गुरुओंं, रहस्यवादियो और दरबार के विद्वानों को आमंत्रित किया। यह चर्चाएं 1582 ई. तक ही चल सकी।

10. उसने हिंदू और मुसलमानों को एक समान धर्म देने के लिए तौहीद ए इलाही नामक नया धर्म चलाया।

11. उसने हिंदू धर्म में फैली बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। और सती प्रथा का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया।

12. उसने हिंदुओं के साथ-साथ शियाओं, सूफियों, जैनियों, ईसाइयों और महादवियों के साथ भी समानता और उदारता का व्यवहार किया। 



अकबर की धार्मिक नीति के परिणाम या प्रभाव | Akbar ki Dharmik Niti ke Parinam



1. राज्य को लाभ- अकबर की धार्मिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि अधिकांश हिंदू व मुसलमान मुगल साम्राज्य के समर्थक बन गए। उन्होंने परस्पर शत्रुतू का दृष्टिकोण त्याग दिया और वे मुगल सम्राट को अपनी सैनिक और प्रशासनिक सेवाएं तथा सहयोग देने लगे। इन सभी के सहयोग से अकबर को सामराज्य विस्तार में अनेक विजय प्राप्त हुईं और विद्रोह को दबाने में सफलता मिली।


2. देश में सद्भावनापूर्ण वातावरण - अकबर की धार्मिक नीति ने देश में शांति सहयोग और सद्भावना को प्रोत्साहन दिया। जिससे व्यापार और वाणिज्य को पनपने में मदद मिली।


3. सामाजिक सुधार- अकबर की धार्मिक नीति ने सामाजिक सुधार में योगदान दिया। हिंदुओं में सती प्रथा जैसी आमानवीय बुराइयों को समाप्त किया। विधवाओं को पुनर्विवाह करने की मान्यता मिली। अकबर ने मदिरा बिक्री को सीमित करने का प्रयास किया। स्वयं मांस को खाना छोड़ कर समाज में शाकाहारी भोजन को प्रोत्साहन दिया।


4. सांस्कृतिक एकता- अकबर की धार्मिक नीति के करण देश ने सांस्कृतिक समन्वय को प्रोत्साहन मिला।‌ उसने हिंदू और मुसलमानों को परस्पर नजदीक लाने के लिए प्रयास किया। उसने संगीत मूर्ति कला और हिंदू वस्तुकला शैली को प्रोत्साहन दिया। उसकी धार्मिक नीति के कारण राज्य धर्मनिरपेक्ष बन सका और सांस्कृतिक एकता को प्रोत्साहन मिला और दिन ए इलाही नामक धर्म का जन्म हुआ और शीघ्र ही वह समाप्त हुआ।


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