औरंगजेब की धार्मिक नीति का वर्णन कीजिए | Aurangzeb ki Dharmik Neeti Kya thee

औरंगजेब की धार्मिक नीति (Aurangzeb ki Dharmik Neeti)

       हेल्लो स्टूडेंट्स आज हम औरंगजेब की धार्मिक नीति क्या थी (Aurangzeb ki Dharmik Neeti Kya thi) के विषय में चर्चा करेंगे। इसके पिछले पोस्ट में हमने अकबर की धार्मिक नीति के बारे में चर्चा की थी, अगर इसके बारे में आपने नहीं पढ़ा तो इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं


          मुगल साम्राज्य के उत्थान का एक बहुत बड़ा कारण अकबर महान की उदारता ( बहुत ज्यादा खुले दिल वाला / या किसी चीज को तुरंत अपनाने वाला) एवं धार्मिक सहिष्णुता (सभी धर्मों का सम्मान करना / या सभी धर्मों को समान मानने वाला) की नीति थी। जिसके फलस्वरूप अकबर को हिंदू जनता का पूरा सहयोग मिला। और जहांगीर तथा शाहजहां अकबर के समान उधार तो नहीं थे लेकिन उन्हें भी हिंदू जनता की सेवाएँ मिलती रही। औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। aur भयंकर संकट के समय भी नमाज नहीं छोड़ता था। अतः औरंगजेब के सिहासन पर विराजमान होते ही मुगल साम्राज्य की धार्मिक नीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। वह इस बात को भलीभांति जानता था कि वह एक ऐसे राज्य का बादशाह है जहां हिंदू जनता अधिक थी लेकिन, औरंगजेब इस्लाम का परम भक्त था। और हिंदुओं को दबाना और उनके धर्म को नष्ट करना अपना परम कर्तव्य समझता था। 

आइए आगे बढ़ते हैं_

          औरंगजेब के विषय में सर वूल्जले हेग ने लिखा है "औरंगजेब एक कट्टरपंथी था जो अपनी बहुसंख्यक प्रजा के धर्म को भ्रष्ट समझता था और यदि संभव हो तो उसे नष्ट करना चाहता था। उसके तरीके बहुत बुरे थे। उसने आर्थिक दमन धर्म परिवर्तन तथा पूजा पर नियंत्रण आदि से अपने उद्देश्य को पूर्ण करने का प्रयत्न किया।" औरंगजेब की धार्मिक नीति असहिष्णुता की नीति थी। वह सभी धर्मों को समान नहीं मानता था| वह अपने धर्म को ही सर्वश्रेस्ठ मानता था| उनकी नीति कुछ इस प्रकार थी_


1. मंदिरों का विध्वंस- औरंगजेब पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने हिंदू मंदिरों को तुड़वाया। अपने प्रथम सुबेदारी के काल में उसने गुजरात के नवनिर्मित चिंतामणि मंदिर को ध्वस्त करके उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण करवाया। सिंहासन पर बैठने के तुरंत पश्चात उसने एक आदेश जारी किया कि "दीर्घकालीन मंदिरों को न गिराया जाए।" लेकिन इस आदेश के बाद भी अनेक मंदिरों का विध्वंस किया गया और उनके स्थान पर मस्जिद की स्थापना की गई। अप्रैल 1669 ई. में उसने अपने एक आदेश जारी किया कि " इस्लाम धर्म के संगठन के आधार पर प्रांतीय अधिकारियों को आदेश दिया गया कि वह काफिरों के मंदिरों एवं शिक्षा संस्थाओं को नष्ट कर दें।" इस आदेश के बाद काशी का विश्वनाथ मंदिर मथुरा का केशव देव का मंदिर (जहांगीर के शासनकाल में वीरसिंह देव बुंदेला द्वारा निर्मित) एवं सोमनाथ का मंदिर तथा उदयपुर, बीजापुर, जोधपुर, कूच, बिहार, उज्जैन व महाराष्ट्र के मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। मथुरा नगरी सदैव क्रूर मुस्लिम शासकों का शिकार रही। अत: औरंगजेब ने मथुरा के केशवदास के मंदिर को नष्ट किया और मथुरा का नाम इलाहाबाद रख दिया। उसने अकबर के सभी हिंदू मंदिरों को तुड़वा दिया। और हिंदुओं की मूर्तियों को दिल्ली एवं आगरा मंगवाया और उन्हें तोड़कर मस्जिदों के मार्गों तथा सीढ़ियां में लगवा दिया।


2. हिंदुओं पर जजिया तथा अन्य कर- अकबर महान ने जिस्म जजिया कर की समाप्ति की घोषणा की थी। औरंगजेब ने उसे पुनर्जीवित कर दिया जो उसका एक मूर्खतापूर्ण कार्य था। उसने पदाधिकारियों को आदेश दे दिया कि जो लोग इस्लाम धर्म स्वीकार न करें उनसे उस समय तक युद्ध किया जाए जब तक कि वे विवश होकर जजिया कर देने के लिए तैयार ना हो जाए। जजिया को पुनर्जीवित करने के विषय में यूरोपीय यूनानी लिखता है कि इसका उद्देश्य बादशाह के रिक्त कोर्स को संपन्न करना था।

         जजिया  कर के अतिरिक्त औरंगजेब ने व्यापार के क्षेत्र में भी हिंदुओं पर कर लगाया 1665 ई. में एक आदेश जारी करके उसने मुसलमानों से उनकी वस्तुओं पर 2% तथा हिंदुओं से 5% चुंगी वसूल की। जादूनाथ सरकार के अनुसार इस विवेक का कारण और धार्मिक पक्षपात नहीं वरन मुसलमानों की व्यापार के प्रति अभिरुचि बढ़ना था। 


3. सरकारी पदों से हिंदुओं को निकालना- औरंगजेब पर एक आरोप yah भी लगाया जाता है कि उसने हिंदुओं को सरकारी पदों से अलग कर दिया। अकबर के शासन काल में तो हिंदू जनता के लिए सरकारी नौकरियां खुली द्वार की तरह थे। परंतु औरंगजेब ने इस नीति को बदल दिया और 1670 ईस्वी के एक आदेश के द्वारा माल विभाग से समस्त हिंदू अधिकारियों को अपदस्थ कर दिया। लेकिन जब इसके परिणाम अच्छे नहीं हुए तो औरंगजेब को विवश होकर पुनः नए आदेश द्वारा मुसलमान कर्मचारियों के साथ हिंदू कर्मचारी भी रखने पड़े।


4. हिंदुओं पर सामाजिक प्रतिबंध- 1665 ई. ke सरकारी फरमान के अनुसार राजपूतों को छोड़कर अन्य कोई भी हिंदू हाथी घोड़े इसके अलावा पालकी की सवारी नहीं कर सकता था। और ना ही अस्त्र शस्त्र धारण कर सकता था। इसके अलावा औरंगजेब ने हिंदू त्योहारों एवं मेलों को मनाए जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। होली, दीपावली के लिए यह आदेश था कि उन्हें सीमित रूप से बाजार से बाहर मनाया जाए।


5. बलात धर्म परिवर्तन करना- औरंगजेब हिंदुओं को मुसलमान बनाना और इस्लाम के प्रति अपना प्रमुख कर्तव्य समझता था। मुस्लिम धर्म ग्रहण करने वाले हिंदुओं को उसने विभिन्न प्रकार के प्रलोभन भी दिए, लेकिन जो हिंदू इन प्रलोभन ओ में नहीं पढ़ते थे उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयत्न किया जाता था। मथुरा के गोकुल नामक जाट के समस्त परिवारों को जबरन मुसलमान बनाना इसी प्रकार का एक उदाहरण था।


औरंगजेब की धार्मिक नीति के परिणाम | Aurangzeb ki Dharmik Neeti ka Parinam



औरंगजेब की असहिष्णु धार्मिक नीति की भयंकर प्रतिक्रिया हुई देश के विभिन्न भागों में विद्रोह का दौर आरंभ हो गया इसमें से कुछ विद्रोह इस प्रकार थे।



1. मथुरा के जाट कृषकों का विद्रोह (1669 ई- .)- सबसे पहले आगरा के आसपास निवास करने वाले जाटों ने गोकुल की अध्यक्षता में विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया, जिसके लिए बहुत सीमा तक तत्कालीन फौजदार अब्दुल नावी खां जिम्मेदार था। उसने औरंगजेब के आदेश पर हिंदू जनता पर अनेक अत्याचार किए तथा सुप्रसिद्ध केशवदेव के मंदिर को नष्ट करके उसके अवशेषों से विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया। अतः जाटों ने अब्दुल नवीन को मौत के घाट उतार दिया। औरंगजेब ने तुरंत हसन अली को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। जाटों ने नेता गोकुल को गिरफ्तार करके उसका वध कर दिया गया तथा उसके परिवार वालों को बलात मुसलमान बना दिया गया। अतः मथुरा में शांति स्थापित हो गई, लेकिन मुगलों की दमनकारी नीति से परेशान होकर 1698 ई. में एक बार पुनः जाटों ने राजाराम के नेतृत्व में मुगलों के प्रति विद्रोह कर दिया। औरंगजेब ने इस विद्रोह को भी बर्बरता पूर्वक कुचलकर राजाराम का वध करवा दिया, लेकिन इसके बाद भी जाट चुप नहीं रहे वे राजा राम के पुत्र चूड़ामणि के नेतृत्व में मुगलों से अंत तक लड़ते रहे।


2. सतनामी संप्रदाय का विद्रोह (1672 ई.)- सतनामी मूल रूप से नारनौल में निवास करने वाले ब्राह्मण साधन थे। यह लोग सदा जीवन व्यतीत करते थे और कृषि एवं व्यापार से अपनी जीविका चलाते थे। यह मुग़ल बादशाह की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के कट्टर विरोधी थे। सतनामी यों के विद्रोह करने के पीछे एक छोटी सी घटना का हाथ था। एक दिन एक सतना में तथा मुगल पहरेदार में नारनौल के निकट झड़प हो गई जिसमें सतना में घायल हो गया। इसके परिणाम स्वरूप सतनामी यों की एक टुकड़ी ने मिलकर उस मुगल पहरेदार की खूब पिटाई की और नारनौल की एक मस्जिद को भी हानि पहुंचाई। इस छोटी सी घटना ने विद्रोह का रूप ले लिया। जब स्थिति काफी गंभीर हो गई तो औरंगजेब ने स्वयं सतनामी यों के विद्रोह के दमन का कार्य अपने हाथों में ले लिया और विशाल मुगल सेना सहित सतनामिययों पर आक्रमण कर सतनामिययों को परास्त किया।


3. सीक्खो का असंतोष— मुगलों के शासन काल में सीखें संघर्ष का बीजारोपण तो जहांगीर के शासनकाल में शुरू हो चुका था, क्योंकि शहजादा खुसरो की सहायता करने के कारण जहांगीर ने 1606 ई. सिख गुरु अर्जुन सिंह का वध करवा दिया था। शाहजहां के समय में गुरु तेगबहादुर सिख गुरु बने। औरंगजेब की धर्मांधता की नीति ने मुगल सीख संघर्ष के बीज को और पल्लवित किया। गुरु तेग बहादुर ने आनंदपुर को अपना मुख्य केंद्र बनाया और औरंगजेब की हिंदू विरोधी नीति का विरोध किया। औरंगजेब ने एक सेना सिखों के दमन है तो भेजी तो गुरु तेग बहादुर पकड़ लिए गए तथा दिल्ली लाकर उन पर इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए जोर डाला गया। और उसके इंकार कर दिए जाने पर 1675 ई. में उनकी हत्या करवा दी गई। गुरु तेग बहादुर की हत्या से सीखो की क्रोधअग्नि और अधिक बढ़ गई। उन्होंने तेग बहादुर के पुत्र गुरु गोविंद सिंह के नेतृत्व में गुरु तेगबहादुर की मृत्यु का बदला लेने का संकल्प लिया। और सीख जाती एक सैनिक जाति में परिवर्तित हो गई।

          गुरु गोविंद सिंह ने साहस एवं उत्साह के साथ मुगलों का सामना किया। आनंदपुर पर मुगलों का दबाव निरंतर बढ़ता गया। मुगलों से युद्ध करते हुए गुरु गोविंद सिंह के 2 पुत्र भी मारे गए और दो पुत्रों को बंदी बनाकर उन्हें दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया। यह घटना 1705 ई. में हुई। औरंगजेब के इन अत्याचारों से भी सिखों का विद्रोह शांत नहीं हुआ। और अंत में विवश होकर औरंगजेब गुरु गोविंद सिंह से संधि करना चाहता था लेकिन 1707 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।


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