सूफी मत क्या था, सूफी मत का विकास और उदय

सूफी मत क्या था ?

सूफी मत का संबंध इस्लाम में रहस्यवाद से है। जहां तक रहस्यवाद का सवाल है, यह भावना है जो हमेशा से प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए मानव को प्रेरित करती है। 

सूफीवाद से तात्पर्य

डॉ.ताराचंद के अनुसार - सूफीवाद प्रगाढ़ भक्ति का धर्म है, प्रेम इनका भाव है, कविता संगीत और नृत्य इसकी आराधना के साधन हैं और परमात्मा में विलीन हो जाना इसका आदर्श है।

सूफी मत का विकास और उदय

        सूफी संत उधर प्रवृत्ति के पोषक थे। उन्होंने भारत में ईरान और मध्य एशिया के अन्य देशों में प्रवेश किया। सूफी मत वह स्रोत है जिसमें अनेक देशों की नदियों का समावेश है। कुरान और पैगंबर मोहम्मद का जीवन इसके मुख्य स्रोत हैं। ईसाई धर्म के प्रभाव से इसका विकास हुआ। हिंदू और बौद्ध सिद्धांतों तथा नास्तिक मतों से उसे पर्याप्त रूप से प्रभावित किया।

        इस संप्रदाय के संत आचार विचार से पवित्र थे। इसका विकास की राह में अधिक हुआ। यह ईश्वर के प्रेम में मगन रहते थे। सूफी संत इस्लाम का अनुसरण करते थे और कर्मकांड के विरोधी थे। उन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं को अपने अनुभव और तर्क की कसौटी पर कसा। भारत से पहले बसरा उनका प्रमुख निवास स्थान था। जहां विभिन्न देशों के सूफी आकर रहने लगे थे और रहस्यों की चर्चा करने लगे। वे इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के बाद उत्पन्न नैतिक पतन के कारण दु:खी थे।

       8वीं शताब्दी में महिला सूफी रूबिया और 10 वीं शताब्दी में मंसूर-बिन-हलाज जैसे प्रारंभिक सूफियों ने ईश्वर तक व्यक्ति के बीच प्रेम संबंध पर बहुत बल दिया। सूफी संतों में इबुल-अरबी प्रथम व्यक्ति था जिसने सूफी जगत में महत्वपूर्ण सिद्धांत को प्रतिपादित किया। कालांतर में 12 वीं शताब्दी तक सूफी 12 सिलसिले में विभाजित हो गए। प्रत्येक सिलसिले का एक नेता या प्रमुख होता था। जो अपने अनेक शिष्यों सहित खानकाह में रहता था।


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