अन्वेषणात्मक शोध पद्धति, उद्देश्य, प्रमुख कार्य, विशेषताएं, उपयोगिता

अन्वेषणात्मक शोध पद्धति किसे कहते हैं?

शोधकर्ता किसी सामाजिक घटना के पीछे छिपे कारणों को ढूंढ निकालना चाहता है ताकि किसी समस्या के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष के संबंध में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो सके तब अध्ययन के लिए जिस शोध का सहारा लिया जाता है, उसे अन्वेषणात्मक शोध कहते हैं।

अन्वेषणात्मक शोध पद्धति का उद्देश्य

इसका उद्देश्य किसी समस्या के संबंध में प्राथमिक जानकारी प्राप्त करने के कल्पना का निर्माण और अध्ययन की रूपरेखा तैयार करना है।

अन्वेषणात्मक शोध के प्रमुख कार्य

  1. पूर्व निर्धारित प्रकल्पनाओं का तत्कालिक दशाओं के संदर्भ में परीक्षण करना।
  2. महत्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं की ओर शोधकर्ता के ध्यान को आकर्षित करना।
  3. अनुसंधान हेतु नवीन प्रकल्पनाओं को विकसित करना।
  4. अंतर्दृष्टि प्रेरक घटनाओं का विश्लेषण करना एवं अध्ययन के नवीन क्षेत्रों को विकसित करना।
  5. विभिन्न शोध पद्धतियों के प्रयोग की उपयोगिता की संभावना का पता लगाना।
  6. शोध कार्य को एक विश्वसनीय रूप में प्रारंभ करने हेतु आधारशिला तैयार करना।
  7. विज्ञान की सीमाओं का विस्तार कर उसके क्षेत्र को विकसित करना।
  8. अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित करने हेतु शोधकर्ता को प्रेरित करना।


अन्वेषणात्मक अनुसंधान की विशेषताएं

1. संबंध साहित्य का अध्ययन- विषय से संबंधित प्रकाशित एक साहित्य का अध्ययन प्रथम अनिवार्यता है। इसके अभाव में हम विषय को सही रूप में नहीं समझ पाएंगे और ना ही ठीक से प्रकल्पना का निर्माण कर सकेंगे। अतः आवश्यक है कि सर्वप्रथम विषय से संबंधित साहित्य का अच्छी तरह से अध्ययन किया जाए। इससे श्रम, समय तथा ब्यय में बचत होगी।

2. अनुभव सर्वेक्षण- यहां आ विषय से संबंधित अनुभव रखने वाले लोगों का पता लगाना उनका चुनाव करना उनसे संपर्क स्थापित करना और उनके अनुभवों से लाभ उठाना इस प्रकार के शोध में आवश्यक है। कभी-कभी शिक्षा के अभाव साधनों की सीमित था एवं कुछ अन्य कारणों से कुछ अनुभव प्राप्त व्यक्ति अपने अनुभव को लिखित में मूर्त रूप नहीं दे पाते हैं। ऐसे व्यक्तियों की खोज और उनके अनुभवों के विषय के संबंध में जानकारी प्राप्त करना शोधकर्ता के लिए नितांत आवश्यक है। यह जानकारी उसके लिए प्रदर्शक के रूप में कार्य करेगी।

3. सही सूचना दाताओं का चुनाव- शोध की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि ऐसे सूचना दाताओं का चयन किया जाए जिनसे विषय के संबंध में ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सके जो अध्ययन हेतु वास्तविक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सके। सूचना दाताओं का चुनाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही विधियों में किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि एक ग्राम पंचायतों का अध्ययन करना है तो प्रत्यक्ष विधि के अंतर्गत सरपंचों, पंचों तथा ग्राम पंचायतों से संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों में से कुछ का चुनाव किया जाना चाहिए। अप्रत्यक्ष विधि के अंतर्गत उन लोगों का चुनाव किया जाना चाहिए जो प्रत्यक्ष रुप से ग्राम पंचायत से संबंधित तो नहीं है, लेकिन जिनके पास इससे संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। ऐसे व्यक्तियों में स्कूल अध्यापकों अन्य सरकारी कर्मचारियों तथा गांव के कुछ सम्मानित एवं समझदार नागरिकों को लिया जा सकता है। इससे विषय के विभिन्न पक्षियों को समझने में मदद मिलेगी।

4. उपयुक्त प्रश्न पूछना- शोध कार्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सूचना प्राप्ति हेतु प्रश्न बहुत सावधानी पूर्वक बनाए जाएं। साथ ही किसी उपयुक्त विधि द्वारा प्रश्न पूछे जाएं ताकि विषय से संबंधित सभी जानकारी मिल सके इसके अभाव में महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकेगी।

5. अंतर्दृष्टि प्रेरक घटनाओं का विश्लेषण- विषय के विभिन्न पहलुओं के संबंध में शोधकर्ता का ज्ञान सामान्यता सीमित होता है। इसी कमी को दूर करने के लिए आवश्यक है कि सभी पहलुओं का गहनता के साथ अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाए। सभी पक्षों को उजागर करने वाली घटनाओं का सूक्ष्म अवलोकन एवं अध्ययन किया जाए। ऐसा करने से विषय के संबंध में एक ऐसी अंतर्दृष्टि प्राप्त होगी जो शोध कार्य की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।


अन्वेषणात्मक अनुसंधान की उपयोगिता

    यह अनुसंधान व्यवहारिक उपयोगिता को दृष्टि में रखकर नहीं किया जाता। किसी समस्या के कारणों को ढूंढ निकालना और उसका हल प्रस्तुत करना भी शोध के अंतर्गत नहीं आता है। विशुद्ध शोध तो ज्ञान के लिए ज्ञान के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ता है। जब किसी घटना की खोज ज्ञान प्राप्ति हेतु की जाए और वह भी वैज्ञानिक या वस्तुनिष्ठता बनाए रखकर तो उसे विशुद्ध मौलिक या आधारभूत शोध कहते हैं। इस प्रकार के शोध कार्य में नीति निर्माण उपयोगिता का दृष्टिकोण सम्मिलित नहीं होता है। विशुद्ध शोध का लक्ष्य किसी समस्या को हल करना या किन्ही आवश्यकता की पूर्ति करना नहीं है बल्कि ज्ञान की प्राप्ति, मौजूदा ज्ञान भंडार में विधि और पुराने ज्ञान का शुद्धिकरण है। सत्य की खोज, रहस्यों को जानने की इच्छा, सामाजिक घटनाओं को समझने की इच्छा ही शोधकर्ता के प्रमुख लक्ष्य होते हैं। इसी दृष्टि से वह निरंतर प्रयत्नशील रहता है। ज्ञान की प्राप्ति तथा मौजूदा ज्ञान के परिमाण जनक एवं परिवर्तन के लिए वैज्ञानिक विधियों को काम में लेते हुए जो शोध कार्य किया जाता है, उसे ही विशुद्ध या मौलिक शोध कहते हैं। इस प्रकार के शोध कार्य द्वारा सामाजिक जीवन के संबंध में मौलिक सिद्धांतों एवं नियमों की खोज की जाती है।

       सामाजिक शोध का उद्देश्य सामाजिक घटना में कारे कारण संबंधों का पता लगाना होता है। साथ ही इस प्रकार के शोध कार्य द्वारा घटनाओं में निहित घटनाओं को संचालित करने वाले नियमों का पता लगाया जाता है। सभी घटनाएं चाहे वह आप प्राकृतिक हो यार सामाजिक कुछ निश्चित नियम के अनुसार ही घटित होती है। इन नियमो को खोज निकालना इस शोध का प्रमुख लक्ष्य है। सामाजिक जीवन एवं घटनाओं के संबंध में मौलिक सिद्धांतो एक नियमों की खोज इस शोध का एक प्रमुख कार्य है। इस प्रकार की शोध ना केवल नवीन ज्ञान की प्राप्ति की जाती है बल्कि पुराने ज्ञान का पुन: परीक्षण द्वारा शुद्धिकरण भी किया जाता है।


निष्कर्ष

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि इस शोध के निंलिखित पांच उद्देश्य हैं- 

प्रथम:- ज्ञान की प्राप्ति

दूसरा:- नियमों की खोज

तृतीय:- सामाजिक संरचना की इकाईयों ‌ संबंधी जानकारी

चतुर्थ:- नवीन अवधारणाओं का प्रतिपादन 

पांचवा:- शोध विधियों की उपयोगिता की जांच।

     यहां हमें इस बात को ध्यान में रखना है कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति एवं घटनाओं के पीछे छिपे नियमों सीखा जाता है|और मानव कल्याण में सहायक होती है। इस शोध द्वारा प्राप्त ज्ञान का प्रयोग व्यवहारिक शोध के अंतर्गत किया जा सकता है और किया जाता है|

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